एक कप चाय
जब कहते हैं वो चाय की तलब है,
तुम्हारे हाथ की चाय में स्वाद गजब है,
अपनी प्रशंसा सुनकर खुश मैं हो जाती हूं,
और करें तारीफ मैं चाय नहीं बनाती हू,
कहती हूं उनसे तुम ही बना दो ना,
अपने हाथ की चाय भी कभी पिला दो ना,
अपने हाथ की पी कर हो गई मै बोर,
भावनाओं को समझा करो, जरा करो तुम गौर,
कहते हैं मैं बना दूंगा पर तुम मेरी बनाओगी---
मैं अच्छी नहीं बनाता तुम भी नहीं पी पाओगी,
चलो कोई बात नहीं फिर भी तुम बना दो ना---
अपने हाथ की चाय का स्वाद भी चखा दो ना,
वह खुश हो जाते हैं---
और अपने हाथों से चाय बना कर लाते हैं,
एक घूंट भर्ती हूं मैं,वो मेरी तरफ टकटकी लगाते हैं,
और तारीफ सुनने के लिए व्याकुल हो जाते हैं,
कहते हैं वह बात नहीं है, तुम्हारे हाथों जैसा स्वाद नहीं है,
सुन सुन कर मैं यह बातें, मन ही मन खुश हो जाती हूं,
और एक कप चाय अपने हाथ की बनाकर उन्हें पिलाती हूं
संगीता वर्मा✍✍
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