पंडित बिरजू महाराज



विरासत में मिली कला और संस्कृति
परंपरा में मिली पूरी परवरिश भी
राजाओं, नवाबों के दरबार की शोभा बने
पालकियों में बैठने का सम्मान पाते रहे,
कालिका, बिंदादीन की ड्योढ़ी के शागिर्द,
अच्छन महाराज और अम्मा के चश्मों चिराग,
अचंभित किया सदैव अपने नृत्य से,
गायन, वादन कलाओं में भी पारंगत थे,
"नृत्य सम्राट" ब्रज मोहन मिश्र थे वो
ब्रज की सभी लीलाओं को किया साकार,
नृत्य-नाटिका हो या ठुमरी हजारों-हजार,
जब करते थे मंच पर प्रदर्शन हर बार,
चमत्कृत करते दर्शकों को बिरजू महाराज,
नटराज और नटवर के थे उपासक भी,
लास्य भाव में करते थे विभिन्न प्रयोग भी,
ताल और लय पर था अद्भुत नियंत्रण,
पल भर में बना देते थे तिहाई और परण,
लखनऊ घराने के सरताज थे पद्म विभूषण,
श्री राम कला केंद्र और कलाश्रम के थे प्रवर्तक
विनम्र, मधुर और हॅंसमुख थे वो सरल हृदय,
शिष्य-शिष्याओं को कथक में ही करते रहे पारंगत,
करते रहेंगे सभी नाम उनका रोशन इस जहॉं में,
वो अमर थे, हैं... और रहेंगे सदा इस जहॉं में!
©मनीषा अग्रवाल

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