"शून्य की ओर"
शून्य सी शान्ति ब्रहमांड में
सूक्ष्म शरीर पर उतरा।
नया वस्त्र धारण किया शरीर
मोह माया के जाल में।
बंधा यहाँ रिश्तों के बंधन में
फिसलन इस संसार में।
भूल गया अपने गंतव्य को
उलझ गया संसार में।
भटकाव यहाँ हर मोड़ पर
फिसलन इस संसार में।
कर्मयोगी तू फिसल रहा क्यूँ
मोह के जंजाल में।
जान ले,इस धरा के प्रारब्ध को
शून्य में समाहित है सब।
फिसलन से बचकर निकल
शून्य की ओर ब्रम्हाण्ड में।।
------अनिता शर्मा झाँसी
------मौलिक रचना
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