परिवार



जब हम सभी इकट्ठे होते लगता जैसे हो त्यौहार।
इस धरती पर हरा भरा उपवन सा मेरा परिवार।।

मेरे घर में आज भी दादा का अनुशासन चलता।
दादा दादी की छांव में मेरा सब परिवार पलता।।

मेरे घर पर लोग सभी जब एक साथ होते हैं।
तब हम अपने मन की सारी सुध बुध खोते हैं।।

अदभुत सा मुझको लगता मेरा घर रूपी संसार।
इस धरती पर हरा भरा उपवन सा मेरा परिवार।।

कितना भी बड़ा काम हो सबका ही साथ रहता।
ऐसा सुख कहीं ना होगा ऐसा मेरा मन कहता।।

जब भी कोई पड़े विपत्ति एक साथ सब रहते हैं।
एक पर पड़ी मुसीबत इकट्ठे होकर सब सहते हैं।।

सब ही साथ में रहते सबका ही संतुष्ट व्यवहार।
इस धरती पर हरा भरा उपवन सा मेरा परिवार।।


नाम - विक्रांत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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