पतंग



आसमान में उड़ती लगती परिंदों से ये न्यारी।
है तो यह निर्जीव पर लगती पक्षी सी प्यारी।।

यह भी मनमौजी सी कभी धरा कभी गगन में।
कभी उड़ती आंखों में ये कभी ओझल गगन में।।

कभी पतंग रहे तो यह कभी यह पंछी बन जाए।
आसमान में जाकर यह सारे अदभुत सुख उठाए।।

आसमान में जब उड़ती लगती अदभुत, न्यारी।
है तो यह निर्जीव पर लगती पक्षी जैसी प्यारी।।

यह दूर गगन में जाकर सारे पक्षी के सुख उठाती।
मुझे देखती दूर गगन से मेरे मन को बहुत लुभाती।।

जब भी यह कट जाती है मेरा दिल दुख जाता।
इसको ऊपर देख कर ही मेरा दिल सुख पाता।।

जब मेरे हाथ में रहती मन मे रहती खुशी प्यारी।
है तो यह निर्जीव पर लगती पक्षी जैसी प्यारी।।

नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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