विरह

जिसकी चाहत पर था गुमां दिल को 
हां सितम दे वो ही तोड़ गया उसको

अंखियों का मीत आंसुओं को बना 
कसक दर्द कि मेरे जिया में सुलगा

हुई दिल कि रुसवाई फ़कत गम देने 
और सिल गए हमीं जैसे बेघर हो तन्हाई में

सारी इनायतों को तुम्हारी ही दरकारें थी 
हां तेरी मेरी एक ही तो खुशगवार धड़कनें थी

सुरतें निहारें गुफ्तगू करें आरजू थी हमारी 
वो रहबर गमों का फसाना दे खो गया भीड़ में कहीं

चांद से शिकवा करूं और तारों से शिकायत 
मेरी मोहब्बत को कफ़न पहना गया हाय वो दगाबाज

दो धड़कनों के इश्क को मुकम्मल ना होने देना 
नफरत -ऐ -फितरत है जमाने की उन्हें जुदा करना

बेकद्रों की दुनियां बस कहती फिरती यही हमेशा से
आवारगी मनचले दिल कि छुपा सभी कहते हैं इत्मिनान से

गर मिल जाए इक दफे वो बेदर्द किसी मोड़ पे 
कहूंगी आहें ले जमाने भर की इश्क नसीब ना हो तुझे फिर से

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