कौन अपने कौन पराये

कहीँ उजालो का संसार 
कहीं अधंकार के साये

हम सोचते ये ही 
कौन अपने कौन पराये

वजूद से लिपटे इस दर्द को
हम किसी से कैसे बताये

दर्द दिया जब अपनों ने
तो इस पीडा़ को कौन मिटाये 

निरर्थक  गयी जिंदगी अपनी
जिनको समझते रहे अपना
वो ही निकले  पराये

इस अंधकार भरे जीवन में
कहीं से तो कोई रोशनी ना नज़र आये

इस अंधकार मय जीवन में
जब अपनें साये भी लगने लगे पराये

वद्धाआश्रम में बैठे उन
माँ बापों को कोई कैसे समझाए

जिनको जीवन भर
समझते रहे वो अपना

आज वो खून के रिश्ते
 न जानें क्यूँ हो गये पराये ।

✍🏼 रानी सिंह

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