बारिश बादल और हवायें
ये सर्द हवायें
ये नटखट बादल
और बातूनी बारिशें
कुछ अधूरा कर गई मुझे
पानी अपना धर्म निभा गई जैसे
ये याद दिलाती
ये नित फाग सुनाती
और मधुर मधु मुलाकातें
मेरे नजदीक कर गई तुमको
नियति का निर्मम उपहास हो जैसे
इन लहरों में
बुझी किरणों में
और दिवा स्वप्नों में
तेरा बारिश बन मुझ पर बरसना
ऊंच-नीच होता सूखे गीले नयनों में जैसे
गगन का आलिंगन
पी गया धरा का दाहन
और तुमने अपने लय में
मेरे अधरों को चूम लिया यूंही
खंडहर होते मनुष्य का ध्वस्त भविष्य हो जैसे
टिप टिप कर
अटक अटक कर
और मगन होकर छज्जे से
लिपट जाती हो अनायास मुझसे
बहुत बड़े आघात से उबरा हो अनाथ जैसे
ये भटकती बूंदें
नयनों में सब कुछ मूंदे
कहकर मुझसे अलविदा
दे जाती जीवन का महात्म्य
धूमिल निष्कर्ष के उपसंहार में जैसे
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