आत्मजय


मन में उमड़ रही विष अंगारों की,
पट दरवाजों को खोल ले...
आह भरेंगी पल 'नैन' आसुओं से,
ना ऐसा कोई झोल ले...

आत्मचिंतन कर तू खुद की,
आगे कैसे क्या होगा???
समय बित गया,तो पचताओगे
ना कोई ऐसा मोल ले...

दुखद भरी है हरकंप से दुनियाँ,
सोचो तुम्हारा क्या होगा?
कर्म करो..सत् कर्म करो,
ना कोई तेरा..ना मेरा होगा...

मन की किंचर उतार-फेंक अब,
व्याकुल मन एकाग्र होगा...
छुऐगा तुम आशमान को,
ना सफलता की आह होगा...


  ✍️ विकास कुमार लाभ
           मधुबनी(बिहार)

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