घर

जिनमें मानव रहता है
मानवता को साथ लिए
माता पिता का साया हो 
बसती जिसमे  काया हो
जोसुख दुःख में  हंसता हो
एक दूजे में बसता हो
अपनो को जो साथ ले
गम सभी के बांट ले
रोज रोज के  झगड़े टंटे
जहाँ न होते प्रेम से
मा बहन बेटी और नारी 
रहती है सब चेन से
 बच्चों की किलकारी गूंजे
दादी नानी को हम पूजे
करते सदा सम्मान सभी का
रखते दिल से ध्यान सभी का 
घर अपना अपना ही होता
रहने सेही काम न होता
जुड़ता जो भी स्नेह प्रेम से
भावनाओ का वास है होता

संध्या पंवार

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