बारिश की रात
बूंदों की सौगात
न जाने क्यू
ऐसा लगा जैसे पतो का नयापन
पिया का अपनापन
मन को छू गया
क्या ठंडी हवा का झोखा
मुझे हुआ एक धोखा
बारिश थी बूंदे थी
पर
ना पिया थे
ना पत्ते थे
एक अहसास जो दिलाता पिया की याद
बरसात की रात
टिप टिप पानी की आवाज
बिजली का कड़कना
पिया का हाथ पकड़ना आज भी याद है
बाइक पर डर से चिपकना न जाने क्यू
हाथों में पिया के
बिजली न थी
एक अहसास जो
दिल को छू गया
पानी की बून्द
गालों को छूकर निकली
वो बारिश नही आँखों का मोती था
संध्या पंवार राजस्थान
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