प्रेम की निशानी


बनाया था कागज का ताज महल
लिखा  था आंखों  पर  मेरी गजल
कुछ  तो  लौटाया  था  मैंने  कभी
कुछ    तेरी    निशानी    रखी  है ।

लिखा  था  मिलकर  हमने  कभी
वो    प्रेम     कहानी     रखी    है।

छोड़ा  ऐसे  क्यों  तूने  हाथ  मेरा
मिल न पाया कभी फिर साथ तेरा
कुछ    संवाद  अधूरे  हमारे   रहे
अधूरी बातें कुछ रूहानी रखी  है।

लिखा............
वो.................

चिठ्ठी  समझ  कर  जला  न  देना
खाक में मेरी दौलत मिला न देना
जमाने की नजर से  मैंने छुपाकर
तस्वीरें   कुछ   पुरानी   रखी   है।

लिखा था.........
वो......... ‌‌

राधा   बनकर   तुझे  पाया  कभी
मीरा बनकर दरश चाहती हूं अभी 
कभी रोते हुए पोंछ गए थे आंसू,
चुनर    वो    धानी     रखी     है।

लिखा था..............
वो............

...✍️ पिंकी मिश्रा

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