यादें
सारा जीवन इसी,उधेड़ बुन में, निकल जाती हैं जिंदगी।
किसने क्या कहा, ये क्या हुआ।
सोच सोच ,ये होता ,तो ये न होता।
पग पग पर इंतिहान लेती हैं जिंदगी।
सारा जीवन इसी,उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी।
कभी पीछा नहीं छोड़ती हैं ये यादें।
उठते बैठते खाते सोते हसते खेलते।
झूठे सपनों में ही बीत जाती हैं जिंदगी
सारा जीवन इसी, उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी।
हमारा जीवन ,नहीं हमारा
डोर दूसरे के हाथों में है।
बस कठपुतली बन नाचती हैं सारी जिंदगी।
सारा जीवन इसी ,उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी।
जीवन के ये विभिन्न उद्गार
कभी हसाँते कभी रूलाते।
हकीकत से ज्यादा,ख्यालों में जीती हैं जिंदगी।
सारा जीवन इसी उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी।
क्या खोया ,क्या पाया।
उलझे रहते इन्हीं सवालों में।
इन प्रश्नों का जवाब ढुंढती रह जाती हैं जिंदगी।
सारा जीवन इसी, उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी।
नीलम गुप्ता नजरिया दिल्ली।
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