तेरी चाह की हलचल

     

मन के उद्गारों में मची एक हलचल।
रुसवाइयों में न बीते फिर से कल।
तन्हा हो सफर ,ओ मेरे हमकदम।
चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल। 

कौन सी मंजिल कहाँ तलक तक है।
न हैं किसी राह की खोज खबर।
बीते यूहीं मेरे साल महीने पल।
चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल। 

मेरे जीवन की कहानियाँ।
बेताब हो कर जाती बिखर।
न रहा कोई अपना सम्भल।
चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल। 

न दिमाग और दिल पर रहा जोर।
जब मर्जी हो जाए तेरी ओर।
न मेरा आज रहा न कल।
चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल। 

चाहत तेरी मेरी दिवानगी है।
न जीते बनता हैं न मरते।
तेरा प्रेम बन गया है गरल।
चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल। 

नीलम गुप्ता (नजरिया)
         दिल्ली

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