शबरी की प्रतीक्षा
अनुराग हुआ प्रभु चरणों से, माया का बंधन तोड़ दिया,
आयेंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया।
थी निम्न जाति की लेकिन वो,प्रभु चरणकमल की भ्रमरी थी।
भक्ति के रंग में रँगी हुई, ऐसी वो माता शबरी थी।।
श्रीराम भक्ति के दीपक को,निज हृदयकमल में जला लिया।
आएंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया।।
प्रभु चरण पखारन को शबरी, प्रतिदिन गंगाजल लाती थी।
निज प्रभु को भोग लगाउंगी, मीठे फल चुन चुन लाती थी।।
कांटा न चुभे पग में कोई, पुष्पों से पथ को सजा दिया।
आएंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया।।
अवतार लिया जब श्री हरिने, पृथ्वी का भार उतारन को।
चल दिये छोड़ कर अवध पुरी, असुरों का दल संघारन को।।
लीला धर की लीला के बस, रावण ने सीता हरण किया।
आएंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया।।
आये जब सहित अनुज के प्रभु, शबरी की कुटिया धन्य हुई।
पाकर दरसन जग पावन का, भिलनी से फिर वो संत हुई।।
अतिसय प्रीती देखी प्रभु ने, नवधा भक्ती उपदेश दिया।
आएंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया।
बर्षों की रही प्रतीक्षा वो, प्रभु दरसन पाकर पूर्ण हुई।
बनकर इक दिव्य ज्योति आभा,प्रभु चरणों में वह लीन हुई।।
दे दिया धाम उसको प्रभु ने, जो सन्तों को भी नही दिया।
आएंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया।
अनुराग हुआ प्रभु चरणों में, माया का बंधन तोड़ दिया।
आएंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया।।
स्वरचित एवं मौलिक
"अप्रकाशित रचना"
शीला द्विवेदी "अक्षरा"
"उरई" जिला-जालौन
उत्तर प्रदेश
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