सर्दियां
सन-सन चलती हुई वो सर्द हवाएं,
आसमाँ में छाई घनघोर धुंध,
और चौपाल में जलता हुआ वो अलाव,
आज भी अकसर स्मृतियों में आ जाता है।
जहाँ जाति-पांति की दीवारें नही थी,
नही थी एक दूसरे के लिए द्वेष भावना,
एक ही चिलम से बारी-बारी कश लिया करते थे,
न ही मंडराता था कभी संक्रमण का खतरा।
कभी राजनीति की बात हुआ करती थी,
तो कभी कहानी और चुटकुले हुआ करते थे,
कभी बांटते थे एक दूजे की परेशानी,
तो कभी घरेलू मुद्दे भी सुलझते थे।
सुबह की वो गुनगुनी धूप,
जहाँ बुजुर्गों की चारपाई
उनके अपनत्व का अहसास कराती है,
तो कहीं चूल्हे पर बनाती हुई
माँ की वो मक्के की रोटी याद आती है।
वो धूप में स्वेटर बुनना
हर सलाई पर एक सवाल पूछना,
खुद को छोड़ सबका ख्याल रखना
कभी चक्की पीसते हुए गीत गुनगुनाना।
हर रोज भजन गा कर जगाती थी,
सच में वो सुबह बहुत याद आती है।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"
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