धरा



सहनशक्ति
से भरपूर है वो,
मेरी धरती।

मिट्टी को सोना,
करने वाली वो है,
पारस मणि।

भार सहती,
पर्वतों नदियों का,
नही चाहती।

धर्म से टिकी,
अधर्म से डरी है,
शांति की धुरी।

वरदान है,
ईस्वर का उसको,
पूजनीय है।

निस्वार्थ भाव,
से करती है कर्म,
नही कोई है स्वार्थ।।।

स्वरचित एवं मौलिक
शीला द्विवेदी"अक्षरा"

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