इंतज़ार

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कभी आऊँगा सचमुच तुम्हारे पास..
और छू लूंगा तुम्हारे वो अहसास
जिन्हें शायद...
तुमने मेरे लिए सहेज कर रखे होंगे।
उन लम्हों में ऐ उम्र..जरा ठहर जाना
खुश्बू की मानिंद मेरे करीब आना,
और..
मेरी रग़ रग़ में समा जाना।
मैं चाहूंगा...
तुम्हारे बालों को सुलझाना,
देखूंगा...
तुम्हारा फूल सा मुस्कराना।
किसी छुई मुई सी...
खुद में सिमट जाना
मैं फैला दूंगा...
तुम्हारे लिए अंकपाश,
छू लूंगा...
तुम्हारे वो अनछुए एहसास ।
वो लम्हें हमेशा याद रखना
फिर ये वक़्त ...
कभी लौट कर न आये,
शायद अगले जन्म तक के लिए।।
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 डॉ0 अजीत खरे
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