तेरी गलियां
यूं कुछ नामुमकिन सा लग रहा है
तेरी गलियों को शब्दो में बयां करना,,,
जहां पूरी जिंदगी गुजारी है,
उसको चंद लफ्जों में सजाना.....
बचपन से लेकर आज तक के एक एक पल याद है,
बाबा तेरी गलियां मेरे मन में कुछ इस तरह समाई है....
सूरज के पहली किरण के साथ
चिडियों के वो मधुर गान
बच्चों के हंसी मजाक और
मां की जल्दी उठानेवाली वो जो डांट.....
मंदिर से आती वो शंख की धुन थी
जो मन में पवित्रता भर देती थी....
वो सुमधुर भजन और घंट के आवाज से
शांति से मन भर आती थी....
हर रोज की तरह लाल रंग की वो कार
रास्ते से गुजर जाती थी,
छोटे बच्चों को अपने पीछे भगाती थी....
खड़े हो जाते थे सुबह सुबह सब मांओं ने
दूधवाली आंटी जब आवाज लगाती थी....
चाय के बहाने टपरी पे लोगों के बातें
गांव से लेके पूरी भारत की होते थे चर्चे.....
अब सब सिर्फ याद करती हूं
याद करके मन को बहलाती हूं...
बाबा
जब से तुम्हारे हाथ छोड़के किसी और के हाथ थामी हूं
पता नहीं क्यों खुद को अकेली महसूस करती हूं....
बाबा तुम्हारी गलियां तो मेरी पूरी दुनिया थी,,
अब उस दुनिया से दूर पता नहीं कैसी जीती हूं....
वो गलियां वो बचपन वो यादें
सब दिल के किताबों में बंद हो गए हैं
हम खुद को भुलाके कोई और बन गए हैं....
ये नई दुनिया कुछ अजीब सा लग रहा है,,,
बाबा तेरी गलियां बहुत याद आ रही है....
सोचती हूं काश कोई हवा उड़ा ले जाए मुझे,,,
छोड़ दे मेरी गलियों में मेरे बाबा के पास....
जहां पैदा हुई थी, काश वही से अर्थी उठे मेरी
मेरी आखरी सांस उड़े बाबा गलियों में तेरी.....
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
ज्योति महापात्र
उड़ीसा
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