हथेली
कहने को तो दो ही है
पर ये हथेली के सौ कहानियां हैं....
उसमे से एक को आज
मेरी कलम ने कविता का रूप दिया है...
छोटी छोटी हथेली में भगवान को फूल चढ़ाती थी
उसी हथेली को जोड़ के बचपन में मंदिर में खड़ी रहती थी....
खूबसूरत तो वो पल भी था
जब मैं खुद अपनी हथेली से भिकारी को खाना देती थी....
छोटी छोटी चूड़ियां पहन कर
सौ बार उस हथेली को देखती थी....
और जब उसपे मेंहदी लग जाए
तो बात तो कुछ और ही थी....
उस हथेली को पकड़ कर बाबा ने
पहले चलना सिखाया,,,
फिर दुनिया दिखाया....
उस हथेली को पकड़ के मां ने लिखना सिखाया
बड़े भाई ने तस्वीर बनाना सिखाया.....
पहले मां की हथेली से निवाला ली थी
और मां तब खुल के मुस्कुराई थी
जब पहली बार मैने अपनी हथेली से खाना खाई थी....
समंदर के किनारे छोटी छोटी हथेली से
रेत की घर बनाती थी....
बन कर तैयार होने पर खूब ताली बजाती थी....
मंदिर के सामने उस हथेली से दिया जलाया करती थी,
हथेली जोड़ के अपनों के लिए दुआ बटोर रही थी....
मां की सिखाने पर सब काम सिख गई थी
बाबा ने बहुत तारीफ किए थे
जब पहली बार अपनी हथेली से खाना बनाई थी....
मेरी हथेली पकड़ कर वो दूसरे की हाथ में दे दिए,,
समाज की रीत है समझा कर मुझे खुद से दूर भेज दिए....
हाथों से मेंहदी के रंग उतरे नहीं थे,,
उसी में काम की बोझ भी कुछ कम न थे....
कोमल सी हथेली को बहुत मजबूत बनाना पड़ा,,,,
जब अपनी ही दुनिया में काम से रिश्ता जुड़ा...
रसोई हो या सिलाई सब में मेरे हथेली ने मेरे साथ दिया,,,
खुश किस्मत हूं मैं जो खुदा ने ये खूबसूरत सी हथेली है दिया....
कभी कभी सोच में भी पड़ जाती हूं
खुदा ने ऐसा अन्याय क्यों किया
जो कितनों से उनका हथेली ही छीन लिया.....
जान कर खुशी बहुत होती है,,,
की वो लोग भी लकीरों पर यकीन करते हैं....
आखें तो सपने देख लेती है....
सपनो को साकार करने में आखिर हथेली भी तो काम आती है....
वही हथेली जोड़ के मैं खुदा के आगे नमन करती हूं,
जिसके सहारे मैं खुद की दुनिया सजा पाई हूं.....
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
ज्योति महापात्र
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