बांझ



रो रही एक मां कई सालों से है,
अपनी ही बेटा उसे बोझ जो बोला है....
तरस रही वो एक बूंद पानी के लिए है,
दाना तो दूर की बात, मुस्कुराने की वजह ढूंढ रही है.....
सोच रही है किसके लिए मैं लड़ रही थी,
जिंदगी भर किसकी हंसी खुशी के लिए तड़प रही ही,
जिसके मुंह में एक दाना देने को मैं चार घर में काम कर रही थी,
वही बेटा मेरी मुंह से दाना छीन कर मजे कर रहा है....
जिसके लिए दुनिया भर की बातों को अनसुना कर के आई,
वो है की मुझसे मेरी जिंदगी है छीनने आई.....
सब कहते रह गए,फिर भी उसको सराखों पर बिठाई थी
मुझे क्या पता था बदनसीबी मेरे ही पीछे मुस्कुरा रही थी....

सोचो जरा एक बार उस मां की बारे में,,
जिसे बोझ से ज्यादा बांझ बनना पसंद है.....
उसकी दिल को दर्द उतनी तो जरूर हुई होगी,,
जो वो मां की बदले बांझ बनना चाहती होगी...
जिस बेटे की मां बन कर वो दुनिया की सामने गर्व से चलना चाहती थी,
उस बेटे की मां बन कर वो बदनसीब से तमाचा खाई थी.....
जिसके लिए वो घर की दहलीज पार करके आई थी,
बिन ब्याही थी, तो कोख में बच्चे को रखके समाज से छुपते छुपाते जिसको बड़ा किया,
जिसके रोने से दिल को बड़ी तकलीफ होती थी,
जिसकी मुस्कुराहट से पूरा दिन अच्छे से गुजर जाती थी,
जिसकी एक जिद से मांगी हुई चीज मिल जाती थी,
अगर उसके मुंह से मां के बदले बोझ सुनने को मिले तो ये जिंदगी ही किस काम की???
इसे अच्छा तो मैं बांझ ही रहती
मैं बांझ ही रहती.....



स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
ज्योति महापात्र
ओडिशा

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें