---उसके बिन ---


वो सुबह अधूरी लगती है
वो चाय अधूरी लगती है
उसकी जो ना ख़बर मिले
अख़बार अधूरे लगते हैं!
वो शाम अधूरी लगती है
महफिल वीरानी लगती है
समझें ना जो जज्बातों को
वो अपने बेगाने लगते हैं!
वो रात अधूरी लगती है
ना नींद सुहानी लगती है
जिन ख़्वाबों मे वो ना आएं
वो ख़्वाब अधूरे लगते हैं!
अब तो उसके बिन मुझको
हर बात अधूरी लगती है
बरसात अधूरी लगती है
सब मौसम विराने लगते हैं!
वो बेगाना लगता अपना सा
अपने बेगाने लगते हैं !!
सतीश निर्दोष
रेवाड़ी (हरियाणा )

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें