--- उफ़ ये बेबसी ---


उफ़ ये बेबसी.......मुझे जीने नही देती!
देखता रहूं रोज डूबते हुए यूं अपनों को 
ये ग़वारा तो नही मुझको
पर बढकर आगे थाम लूं हाथ मै उनका 
हालातों की आंधी ये इजाजत नही देती!
मरने के डर से यूं हर रोज टुकड़ों मे मरना 
ये पसंद तो नही मुझको 
पर क्या होगा मेरे अपनों का जो मै ना रहा 
ये सोच मुझे एक झटके मे मरने नही देती!
यूं मिटा देता ये दुनिया की सारी तकलीफे
जो होता मै ख़ुदा 
पर जानता हूं क्या हैं हदें इक इंसान की 
जो चाहकर भी ऐसा कुछ करने नही देती!
उफ़ ये बेबसी मुझे जीने नही देती
और अपनों की ये चाहत मरने नही देती !!

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें