वक्त
रेत की मानिंद,
फ़िसल रहा है वक्त,
कितना भी थामों हाथों से,
बस यूँ ही सरक रहा है वक्त,
आँखो में ठहरे रहते है ख्वाब,
आँधी सा गुजर जाता है वक्त,
हम चंद लम्हों में कैद रह जाते है,
अभी अभी उफ़नकर बह गया है,देखो
घर के किसी कोने में नाचता ये वक्त,
अपने वजूद की क्षत-विक्षत लाश उठाए,
हम दर-बदर फ़िरते ही रहे, और
कतरा-कतरा बहता रहा ये वक्त,
ताउम्र जिंदगी के थपेड़े,
पेशानी पर बजते रहे,
मौन की लकीर सा,
गुजर गया वक्त
✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
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