खामोशियों के तलबगार



खामोशियों के 
तलबगार तो बहुत है, 
पर सौदा तो शोर से ही करते हैं 
रिश्ता तो शोर से है, 
पर हमेशा खामोशी की ही 
ख्वाहिश है, 
ऐसा क्यों है? 
रिश्ते से पहले तो 
शोर कितना पसंद था तुम्हें, 
फ़िर उससे जुड़ते ही 
खामोशी के बुर्के में 
पसंद क्यों है ?
शोर की बेबाकी 
कितनी पसंद थी तुम्हें, 
पर अब खामोशी के 
शर्मिलेपन की 
तुम्हें तलब क्यों है ?
मुझे तो लगा था 
कि तुम मेरे "उस"
शोर को समझते हो 
जिससे नफ़रत थी,मुझे 
तुम उसी भीड़ का 
हिस्सा क्यों हो ?
शायद शोर बेबाक लफ़्ज़ों का 
पुलिन्दा है,और 
खामोशियों के तो 
अपने लफ़्ज़ ही नहीं होते 
यही बात हैं ना !!

✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸
(स्वरचित)सर्वाधिकार सुरक्षित

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