अजीब लगता है अपने समाज में। पुरूष रसोई में,महिला दफ्तर में। पर इसमें क्या ही बुराई है। रसोई में पुरुष भी अच्छाई है। कुछ देवियां बेशक बहाने करती हों। रसोई के कामों से जी चुराती हों। पर मांग है आज के समाज की। दोनों मिल संभाले रसोई और बाहर के काज की। महिला अगर थक कर आए। तो पुरूष भी उसका हाथ बंटाए। पुरूष का जेब हल्का पड़ जाए। तो महिला उसका हाथ बंटाए। -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण
जब आखिरी अदालत मे तेरा मुझसे सामना होगा मुझे यकीन है पूरा पलड़ा मेरा ही भारी होगा एक तरफ होगी मेरी मोहब्बत दुसरी ओर तुम्हारी जफा होगी एक तरफ होंगे मेरे बहाये आँसू तेरा मुझपे हँसना दुसरी ओर होगा जब चलेगा मुकदमा आखिरी अदालत मे तब मेरा वकील मेरा खुदा होगा। तब तुम पर लगेंगे इल्जाम बेवफाई के और चश्म्दीद गवाह ये आँसू होंगे। उस आखिरी अदालत के तराजू मे जब रखे जायेंगे सबूत तेरी जफा के तब मेरा वकील मेरी ओर से दिखायेग सबूत मेरी वफा के मुझे यकीं है मुकदमा ये चलेगा जब आखिरी अदालत मे तब हर बहस के बाद मुझे मिलेगी जीत आखिरी अदालत मे। कविता गुज्जर
मेरा बचपन मुजफ्फरनगर के छोटे से गांव में बीता , सुरुआती शिक्षा भी यही हुई , गांव में स्कुल के नाम पर एक प्राइमरी स्कूल था, जो हमारे घर के पीछे ही था , आगे की पढ़ाई के लिए लड़कों को तो पास के शहर भेज दिया जाता था , और लड़कियां बेचारी बिना पढें ही रह जाती , गांव में एक " सत्यवती " नाम की महिला अपनी जान पहचान में आई थी , अच्छी पढ़ी लिखी थी , गांव में बच्चियों की शिक्षा के बारे में जानकर बहुत दुःखी हुई , गांव के लोगों को बेटियों को शिक्षित करने के फायदों के प्रति जागरूक किया , उसके प्रयास से गांव में कन्या पाठशाला खोलने का प्रस्ताव रखा गया , उस पर काम भी शुरू हो गया ,फिर कुछ लोगों के सहयोग से चंदा इक्क्ठा किया गया , एक महाशय ने स्कुल के लिए जमीन भी दें दी , इमारत भी बन कर तैयार हो गई , लेकिन स्कुल को सरकार से मान्यता प्राप्त नही हो पाई , अब क्या कर सकते थे , आशा की जो किरण दिखी थी , वो भी धूमिल हो गई , लेकिन कहते हैं ना , जहाँ चाह हैं वहां राह हैं , " सत्यवती " बहन जी ने मन में ठान ली थी ,कि बच्चियों को शिक्षा दिला कर ही मानेंगी , सब लोग उन्हें " बहन जी...
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