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बरसात की बूंदें

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हमसे पूँछ रही है बरसात की बूंदें पता तुम्हारा..... रहते हो मुझमें तुम और पता बता दिया दिल है हमारा..... सावन की पहली बरसात जो तुम से मिलने आएं....... बूंदों में मुझे तुम देख लेना....... पीकर तुम उन बूंदों को मन अपना भर लेना..... फिर भी अगर तन्हाई न जाएं........ ख्वाबों में मुझे तुम बुला लेना...... अपनी नींदों में मुझे तुम सुला देना....... हमसे पूँछ रही है बरसात की बूंदें पता तुम्हारा..... रहते हो मुझमें तुम और पता बता दिया दिल है हमारा..... देखों बारिश तुम से मिलने आई  है..... हवाओं में भी मदहोशी छाईं है..... एक अलग खूशबू फूलों में समाई है..... धरा की खूबसूरती मन को भाई  है..... नदियों ने भी अपने किनारों से छलांग लगाई है..... फिर भी मौहब्बत में ये कैसी तन्हाई है..... हमसे पूँछ रही है बरसात की बूंदें पता तुम्हारा..... रहते हो मुझमें तुम और पता बता दिया दिल है हमारा..... मिल जाना तुम भी इन बूंदों में..... खो जाना इनकी सादगी में..... भर लेना तुम इन्हें अपने आगोश में..... कर लेना तुम इन्हें अपने कैद में..... आओं कभी तुम भी हमारी यादों में..... चाहत की बरसातों में, चाहत की ...

आज फिर एक दीवाना

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आज फिर एक दीवाना गाना गायेगा  जिंदगी का वो हर तराना सुनाएगा  ये जिंदगी का सफर भी कितना हसीं है  मिल जाए हर ख़ुशी मगर मिलता नहीं है  मनुष्य अपने संघर्ष से पहचाना जाएगा  आज फिर एक दीवाना गाना जाएगा   जिंदगी का वो हर तराना सुनाएगा बहुत मेहनत लगती है नाम बनाने मे  और जरा सी देर नहीं लगती पहचान मिटाने मे  मनुष्य अपने कर्मों से ही जाना जाएगा  आज फिर एक दीवाना गाना गायेगा  जिंदगी का वो हर तराना सुनाएगा वही सफल है आज जिसमे कुछ कर गुजरने की प्यास है  हताशा के सागर मे भी जीवन की तलाश है  मनुष्य अपने जूनून से ही अपना भाग्य बनाएगा  आज फिर एक दीवाना गाना गायेगा  जिंदगी का वो हर तराना सुनाएगा पहाड़ को चीर कर जो रास्ता बनाएगा  एक दिन वही अपने मंजिल को पाएगा   शमा की याद मे आज परवाना गाएगा  आज फिर एक दीवाना गाना गायेगा  जिंदगी का वो हर तराना सुनाएगा आपका मुकेश लखनवी

भारत

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भारत के गौरव भूमि पर नेताओं का ही राज हुआ  बहुत दिनों से ललचाए बैठे था आज सिद्ध उसका काज हुआ नेताजी और बापू के देखे सपने सब बर्बाद हुआ  जो ना हुआ था 74 वर्ष पहले वह आर्यवर्त में आज हुआ राम राज्य का शपथ हुआ पर कलयुग में ना राम हुआ  यह देखो बैठे हैं चोर, उचक्के कलयुग में इनका ही नाम हुआ  अब चोर उचक्के का ही भारत में सम राज्य हुआ भारत के गौरव भूमि पर नेताओं का ही राज हुआ मुखौटा पहने बैठे हैं  सब देशद्रोही अपने ही देश में देश के कोने-कोने से निकल रहे आतंकवादियों के भेस में बापू नेहरू और सुभाष को इसी भूमि पर नाज हुआ  भारत के गौरव भूमि पर नेताओं का ही राज हुआ स्वरचित एवं मौलिक सुशील चौधरी  जंदाहा वैशाली बिहार

ईश्वरचंद्र विद्यासागर

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ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म  बंगाल में हुआ था ,वो बहुत बड़े  समाज सुधारक ,लेखक,दशनिक,शिक्षाविद  और उद्यमी थे। दयालुता , नम्र,और अहंकार रहित जैसे सद्गुण उनके आभूषण थे।  एक बार  उन्होंने एक नौजवान युवक को भीख मांगते देखा। वह युवक उनके पास भी आया और उनसे 1 पैसे मांगने लगा। ईश्वरचंद्र ने उससे पूछा अगर तुम्हें ज्यादा पैसे दिए जाएं तो तुम क्या करोगे? युवक सकपकाया _उसने कहा ,अगर मुझे ज्यादा पैसे मिलेंगे तो मैं  कुछ सामान खरीदूंगा और उसे गली मुहल्ले में बेचूंगा,और मुनाफा कमाने की कोशिश करूंगा। ईश्वरचंद ने उसे 1 पैसे के बदले 1रुपए दिए और आगे बढ़ गए। कई महीनों बाद वो एक बार कोलकता  की  सड़क से गुजर रहे थे ,तभी एक  संभ्रांत  नवयुवक जिसने उनके पैरों पर गिर गया। उन्होंने उसे उठाया ,और पूछा कौन हो तुम भाई? जी मैं वही युवक हूं ,जिसे आपने 1रुपए दिए थे। आज मैं शहर का बड़ा व्यापारी हो गया है ,ये सब आपके सहयोग के बिना असंभव था। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने कहा _ये सब तुम्हारी मेहनत का नतीजा है ,उस पैसे को तुमने सही ढंग से सही जगह प्रयोग किया,वही अगर ...

नशा

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"अरे बहू!!कहाँ जा रही हो इतना सामान लेकर"?? "बस मां जी!!अब और नही आखिर आपके शराबी बेटे को कब तक बर्दास्त करूँ,बात जब मेरी थी तो मैंने हर चुनौती स्वीकार की लेकिन अब मैं अपने बेटे की परिवरिश ऐसे माहौल में नही कर सकती जहाँ खुद उसके पिता आये दिन शराब के नशे में उसकी माँ के साथ अभद्र व्यवहार करता हो"। मां जी अपने  बेटे को स्त्रियों की इज्जत करना नही सिखाया उसका नतीजा तो आप देख रही हों कि आपका बेटा स्वयं आपकी इज्जत नही करता। मैं अपने बेटे को एक अच्छा इंसान बनाउंगी जो यहाँ पर सम्भव नही है। और निशा ने आज वो दहलीज पार कर दी।

स्वर्णिम पथ का आगाज़ हैं

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वक्त कैसा भी हो रुकता नही ठहरता नही एक पल चलता रहता हैं। ये आँधियों का वक्त भी निकल जाएगा, चीर के सीना समुद्र का अमृत बाहर आएगा। अँधेरा हो चाहें कितना चिराग से रोशन होता हैं। नाउम्मीदी में ही उम्मीद छिपा रहता हैं। धीरज रख थोड़ा संभल आगें शीतल छाँव हैं। सहयोग कर, आगें बढ़ दुआओं से पिघलता आसमाँ हैं। माना कठिन हैं, डगर अभी राह बड़ी कँटीली हैं। पर काँटों के बीच में महकता गुलाब हैं। वक्त हैं, ये रुकेगा नही आज अँधेरा, कल प्रभात हैं। आशा की मरिचि संग स्वर्णिम पथ का आगाज़ हैं। गरिमा राकेश गौत्तम खेड़ली चेचट राजस्थान

नन्हा बचपन

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एक सुनहरी चिडियाँ है ये बचपन, मत बांधो इसे किसी डोर से,उड़ने दो, रिश्तों मे मिठास लाता है ये बचपन, माँ की ममता का सैलाब है ये बचपन, पिता की मंजिल का आगाज है ये बचपन, अपनी ही धुन मे रहता हैं ये बचपन, हवा के साथ उड़ता है ये बचपन, अपनेपन की पहचान होता हैं ये बचपन, सभी चिंताओ से मुक्त होता हैं ये बचपन, निस्वार्थ प्रेम सिखाता है ये बचपन, बदमाशीयो,मस्तीयो का खजाना है ये बचपन, कुटाई के बाद भी वही काम करता है बचपन, बड़ा ही नटकट और प्यारा है ये बचपन, सच- मुच बहुत ही नन्हा है ये बचपन ।