स्वर्णिम पथ का आगाज़ हैं


वक्त कैसा भी हो
रुकता नही
ठहरता नही एक पल
चलता रहता हैं।
ये आँधियों का
वक्त भी निकल जाएगा,
चीर के सीना समुद्र का
अमृत बाहर आएगा।
अँधेरा हो चाहें कितना
चिराग से रोशन होता हैं।
नाउम्मीदी में ही उम्मीद
छिपा रहता हैं।
धीरज रख थोड़ा संभल
आगें शीतल छाँव हैं।
सहयोग कर, आगें बढ़
दुआओं से पिघलता आसमाँ हैं।
माना कठिन हैं, डगर अभी
राह बड़ी कँटीली हैं।
पर काँटों के बीच में
महकता गुलाब हैं।
वक्त हैं, ये रुकेगा नही
आज अँधेरा, कल प्रभात हैं।
आशा की मरिचि संग
स्वर्णिम पथ का आगाज़ हैं।
गरिमा राकेश गौत्तम
खेड़ली चेचट राजस्थान

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