नया अवसर



शाम का समय था। सब पंछी अपने रैन-बसेरे की तरफ उड़ रहे थे। पूरे दिन की थकावट के बाद अपने घोंसले में जाकर कितना सुकून और‌ आराम मिलता है। अपने परिवार से मिलकर सारी थकान दूर हो‌ जाती है। 

अंकुर समुद्र किनारे बैठा ये सब देख रहा था।‌ मन में एक हूक सी उठ रही थी कि चल अपने घर की तरफ चल। पर कदम थे कि उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे।‌ किस मुंह से घर जाएगा। नौकरी से हाथ धो बैठा था।

अंकुर एक कुरियर कम्पनी में डीलीवरी का काम करता था। आमदनी इतनी तो नहीं थी पर गुज़र बसर हो जाती थी। वह एक छोटी सी चॉल में अपनी पत्नी साक्षी और दो साल की बिटिया नुपुर के साथ रहता था।‌ 

शाम ढल चुकी थी। वह भारी मन से उठा और घर की तरफ चल दिया। रास्ते भर सोचता जा रहा था कि क्या ज़रूरत थी उसे कम्पनी के मालिक के आगे ज़ुबान चलाने की। माना गलती उसकी नहीं थी पर सिर झुका कर पगार में से कटवा लेता। कम से कम नौकरी से हाथ तो नहीं धोना पड़ता। 

गरीब को अमीर हमेशा दबा कर रखते हैं। और अपनी ग़लती गरीब पर थोप देते हैं।‌आज भी कुछ ऐसा ही हुआ था। अंकुर के बॉस के भाई की गलती के कारण एक बहुत मंहगा पार्सल टूट गया। पर उसने ना जाने कैसे सारी गलती अंकुर पर डाल दी। अंकुर ने अपने बॉस को बहुत समझाने की कौशिश की पर वो मानने को तैयार नहीं हुआ। तो अंकुर ने गुस्से में आ कर नौकरी छोड़ दी। 

घर पहुंच अंकुर बहुत बेचैन था। वह जानता था कि उसका चेहरा देखते ही साक्षी पहचान जाएगी कि वह परेशान है। इसलिए वह खुश रहने का नाटक करता रहा। ज़्यादा समय अपनी बिटिया के साथ खेल में ही लगा रहा जिससे साक्षी को कुछ पता ना चले। 

खाना खाते समय भी वह चुप था। इसी उधेड़बुन में था कि अब घर कैसे चलाएगा। ये महीना तो निकल‌ जाएगा पर अगले महीने कैसे करेगा? घर का किराया, राशन पानी, बिजली और मोबाइल बिल, सब कैसे देगा। 

सारी रात करवटें बदलते हुए गुज़ार दीं। अगली सुबह जब वह देर तक सोता रहा तो साक्षी को ताज्जुब हुआ।

"अंकुर उठो। आज‌ ऑफिस नहीं जाना क्या?" 

"हां….वो आज…तबियत खराब सी है। जाऊंगा…पर थोड़ी देर से।" 

कुछ घंटों बाद अंकुर साक्षी को झूठ बोलकर निकल पड़ा कि वह ऑफिस जा रहा है। कुछ समय पास के पार्क में बैठा रहा। फिर सोचा कि अलग-अलग कुरियर कम्पनी में जाकर देखे कि शायद कोई नौकरी मिल जाए। 

मन बहुत व्यथित था। घबराहट भी बहुत हो रही थी।‌ तभी उसे किसी ने पीछे से आवाज़ दी। उसने पलट कर देखा तो उसका पुराना दोस्त हेमंत खड़ा था। 

"कैसा है अंकुर? कहां है आजकल?" हेमंत बोला।‌

"बस…यार…ऐसे ही…एक कुरियर कम्पनी में काम करता हूं। तू बता?" अंकुर ने अपनी परेशानी छुपाते हुए कहा। 

"कुरियर कम्पनी? अरे वाह! सही समय पर मिला है। देख मैं और मेरे दो दोस्तों ने मिलकर एक कुरियर कम्पनी खोली है। पर हमें ज़्यादा अनुभव नहीं है। हम ऐसे लोग ढूंढ रहे हैं जो इस फील्ड में पहले से हों। जिनके अनुभव से हम कम्पनी चला सकें। तो…. क्या तू काम करेगा हमारे साथ?" हेमंत ने पूछा।

आज भगवान ने पहली बार इतनी जल्दी मन की मुराद पूरी कर दी। 

"बिल्कुल! कब से आना है?" अंकुर ने खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा। 

"आज से, अभी से। चल दिखाता हूं तुझे ऑफिस।" हेमंत उसे अपने साथ ले गया। 

कल रात अंकुर कितना दुखी और परेशान था। पर आज एक नयी सुबह का उदय हुआ। एक ऐसी सुबह जिसने उसके जीवन को हमेशा के लिए पलट दिया। हर अंधेरी रात के बाद एक नये सूरज का उदय होता है। जो उस अंधकार को चीर कर एक नयी रौशनी लाती है। 
🙏
आस्था सिंघल

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