किस्मत की किताब
न जाने कितने ही पन्नों की होती है, ये किस्मत की किताब, इसमें ही छुपा होता है, हमारी जिंदगी का हिसाब| आज यही बैठी हुई सोच रही थी, कि क्या खोया और क्या पाया| फिर मैंने देखा कि.... कुछ पन्ने फट गये थे, कुछ पीले पड़ गए थे| कुछ पन्नों की स्याही फीकी पड़ गयी थी, और कुछ पन्नों पर धूल चिपक गयी थी। मगर कुछ पन्नों में ऐसी बात न थी..!! उनको पढ़ने का वक्त ही मिला...! और जिनकी मुझे याद भी न थी...! कुछ पन्नें अपने से लगते थे! और कुछ बेगाने से| कुछ पन्नों के अंदर मिली थी... गुलाब की पंखुड़ियाँ... जो किसी की याद दिला रहीं थीं| जिसको देखकर होठों पर आ रही थी मुस्कुराहट| और कुछ पन्नों में रक्खे हुए थे... मोर के पंख जिसे देख सहेलियों की आ रही थी याद और हसीं भी,, क्योंकि याद आ रहा था कि कैसे लड़ाई करते थे हम मोर के पंख के लिए कि जल्दी से हमारे हाथों में आ जाए ये पंख,, जिसे देख याद आ रहा था बचपन का जमाना| सजावट से ही सबकी किताबें रंगीन बनती थी....! और मनचाहे रंगों से ही तकदीर बनती थी....!!...