अजीब लगता है अपने समाज में। पुरूष रसोई में,महिला दफ्तर में। पर इसमें क्या ही बुराई है। रसोई में पुरुष भी अच्छाई है। कुछ देवियां बेशक बहाने करती हों। रसोई के कामों से जी चुराती हों। पर मांग है आज के समाज की। दोनों मिल संभाले रसोई और बाहर के काज की। महिला अगर थक कर आए। तो पुरूष भी उसका हाथ बंटाए। पुरूष का जेब हल्का पड़ जाए। तो महिला उसका हाथ बंटाए। -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण
एक कप चाय,दिन बन जाये। पी के कहे दिल,मजा आ गया हाय। सुबह सुबह पाए ,आलस को भगाय। जाड़े के दिन हो ,तो सर्दी पास न आये। हो रेस्तरां की ,या घर पे बनाये। बस देख के ही, चाय मन ललचाये। पीके कभी दूर हाइवे पर ,ढाबे की चाय। मन कहे एक और ,कुल्हड़ वाली चाय। खुद से बनाये या, किसी के घर जाए। बस एक कप एक कप बस ,अदरक वाली चाय। मुफ्त में कोई पिलाये,तो स्वाद ज्यादा आये। एक कप चाय☕ दिन बन जाये।
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