मेरा बचपन मुजफ्फरनगर के छोटे से गांव में बीता , सुरुआती शिक्षा भी यही हुई , गांव में स्कुल के नाम पर एक प्राइमरी स्कूल था, जो हमारे घर के पीछे ही था , आगे की पढ़ाई के लिए लड़कों को तो पास के शहर भेज दिया जाता था , और लड़कियां बेचारी बिना पढें ही रह जाती , गांव में एक " सत्यवती " नाम की महिला अपनी जान पहचान में आई थी , अच्छी पढ़ी लिखी थी , गांव में बच्चियों की शिक्षा के बारे में जानकर बहुत दुःखी हुई , गांव के लोगों को बेटियों को शिक्षित करने के फायदों के प्रति जागरूक किया , उसके प्रयास से गांव में कन्या पाठशाला खोलने का प्रस्ताव रखा गया , उस पर काम भी शुरू हो गया ,फिर कुछ लोगों के सहयोग से चंदा इक्क्ठा किया गया , एक महाशय ने स्कुल के लिए जमीन भी दें दी , इमारत भी बन कर तैयार हो गई , लेकिन स्कुल को सरकार से मान्यता प्राप्त नही हो पाई , अब क्या कर सकते थे , आशा की जो किरण दिखी थी , वो भी धूमिल हो गई , लेकिन कहते हैं ना , जहाँ चाह हैं वहां राह हैं , " सत्यवती " बहन जी ने मन में ठान ली थी ,कि बच्चियों को शिक्षा दिला कर ही मानेंगी , सब लोग उन्हें " बहन जी...
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