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नारी तुम विश्वास हो।

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शीर्षक:- "नारी तेरे रूप अनेक" नारी तुम विश्वास हो, श्रद्धा हो अरदास हो, तेरे दूध से फलती-फूलती सृष्टि, तुम धरती आकाश हो। नारी तुम विश्वास हो। वैभवता की देवी हो तुम, ज्ञान का भंडार हो, देवों की माता तुम्हीं, तुम धरती आकाश हो। नारी तुम विश्वास हो। तुम्हीं स्रटा, तुम्हीं कर्ता, तुम पापों का संहार हो, सृष्टि का आगाज तुम्हीं से, तुम धरती आकाश हो। नारी तुम विश्वास हो। कोमलता की मूरत हो तुम, अंतरिक्ष को भी भेदनेवाली हो, हर क्षेत्र में वर्चस्वी तुम्हीं, तुम धरती आकाश हो। नारी तुम विश्वास हो। पहचानो तुम रूप को अपने, तुम ईश्वर का वरदान हो, उमा, शारदा, शक्ति तुम्हीं, तुम धरती आकाश हो। नारी तुम विश्वास हो। स्वरचित रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

साथ हो ना हो पर साथ हो।

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वो रुक्मिणी थी तेरी जो संग तेरे चली गईं, मैं राधा थी तेरी में ठगी सी रह गई। उसके प्रेम पत्र पर तुम दौड़े चले आए, मेरे तो आंसुओं पर भी तनिक न रिझाए। मैं तेरी राधा बनी ही रहना चाहती हूँ, रुक्मिणी के संग तो जामवंती, सत्यभामा भी पाती हूँ रुक्मिणी  संग रहकर भी संग नही थी, राधा संग न रहकर भी संग ही थी। प्रीत तुझको, मुझसे  राधा सी हो, साथ हो ना हो पर साथ हो। गरिमा राकेश गौत्तम कोटा राजस्थान

नारी के किरदार

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मैं नारी गीली मिट्टी सी, तुम बन जाओ कुम्हार जिस रूप में ढालोगे मुझको दिल , से निभाऊंगी वो किरदार........। जो रूप दोगे राधा का प्रीत की रीत निभाऊंगी, आधा होके भी पूरा होता,प्रेम तुम्हें दिखलाऊँगी मैं हर किरदार निभाऊंगी...............। जो रूप दोगे सीता का धर्म कर्म सिखलाउंगी, अग्नि परीक्षा दे के धरती में समा जाऊँगी मैं हर किरदार निभाऊंगी..........। जो रूप दोगे रानी का रणनीति भी दिखाउंगी, ममता को आँचल में बाँध युद्ध करके दिखाउंगी मैं हर किरदार निभाऊंगी..........। जो रूप दोगे क्षत्राणी का राजनीति भी सिखाऊंगी, शत्रु जो डाले बुरी नज़र  जौहर भी करके दिखाउंगी मैं हर किरदार निभाऊंगी...........।                                  ऋचा कर्ण✍✍                           

नारी तेरे रुप अनेक

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हाँ! है गर्व तुम्हें हो पुरुष तुम, नर हो- सृष्टि के रक्षक हो- मेरे गर्भ से उत्पन्न हुए हो- नारी हूँ मैं!!  एक हूँ मैं और अनेक भी  हूँ मैं-  जिसकी रक्षा करने का दम भरते हो-जिसका अंश भर हो तुम- वह  सम्पूर्ण सृष्टि हूँ मैं!  मेनका हूं- रंभा हूँ- हाँ सौंदर्या हूँ मैं- लज्जा हूँ-  सौभाग्या हूँ मैं- इंद्राणी भी हूँ मैं!  यति, योगिनी, माया, दुर्गा निर्भया-- सब ही तो हूँ मैं!  मोहन की मोहिनी, नारायण की नारायणी हूँ मैं  कृष्ण की बंसी में जो धुन बन कर बस्ती हूं वो राधा हूँ मैं मैं तारिणी- भागीरथी,  बद्री विशाल की भव्यता को  दिव्यता प्रदान करती जो करती,  सूर्य की अल्का हूँ- अलकनंदा हूँ मैं मैं पापमोचिनी गंगा हूँ,  करुणामयी कालिंदी हूँ-  ममतामयी नर्मदा भी मैं...  राजा हैं राम जिस भूमि के,  उनके हृदय में बसने वाली- भूमिजा हूँ मैं- मैं सृष्टि हूँ- जीवनदायिनी प्रकृति हूँ मैं  हाँ- स्त्री हूँ मैं!! सौंदर्या हूँ- लज्जा हूँ- सौभाग्या हूँ मैं!  मोहन की मोहिनी, नारायण की नारायणी हूँ मैं!  कृष्ण की बंसी मे...

हॉ मैं नारी हूँ।।

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बड़े भाग्य से मैंने नारी तन है पाया,  अलग -अलग रूप लेकर मैंने जीवन को है बचाया।। कभी वकील तो,  कभी शिक्षिका बनकर जीवन को है सवारा।।  कभी मालिन बनकर,  तो कभी मॉ बनकर,  मैंने सृजन का भार उठाया।। विधाता की मैं रचना अनुपम, समंदर सा हृदय रखती हूँ, सब के अवगुणों को अपने   भीतर छुपा लेती हूँ।। पत्नी बनकर सदैव  पति से दो कदम पीछे ही चलती हूँ, लडखडाते है कंदम जहा उनके, मैं आगे बढ़कर सँभाल लेती हूँ,।। कभी मंत्री बनकर, उत्तम सलाह देती हूँ, तो दासी बनकर, घर सवार हूँ।। जीवन मे सब आगे बढे , मैं सर्वदा यही प्रयत्न करती हूँ, सब को आगे बढ़ाने में  मैं खुद पीछे रह जाती हूँ।। अपनो की तरक्की देखकर मै, खुद हो क़ामयाब मान लेती हूँ, हॉ मैं नारी हूँ ये बात मैं गर्व से कहती हूँ।। सुमेधा शर्व शुक्ला      हरियाणा

नारी के अनेक रूप है

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सच मे नारी के अनेक रुप है,        माँ, बहन, पत्नि, बेटी,  नारी ही ममता की मूरत, सच की सूरत है,  भाई की सजाती कलाई, फिर भी कहलाती पराई है,  घर मे लगी आंगन की तुलसी, तो घर की लक्ष्मी है,                 गंगा की पवित्र धारा ,  तो घर को सम्हालने वाली अमृत का प्याला,  पुरुष के जैसी नहीं, पर पुरूषों   से कम नहीं,  शक्ति और ममता की गागर,  प्रेम, करूणा की सागर,  जगजननी, भी है वरदानी भी है,  नौ रात्रि मे नौ रूपों मे पूजी  जाती है,  पर नौ नहीं अनेक रूप नारी के है,  शक्ति से है परिपूर्ण, पर न करती अभिमान      नारी से ही है संसार   नारी ही शिव की गौरी,  तो काली बनकर करती दुष्टों का संहार l सच मे नारी के है अनेक रूप।।

आखिरी खत

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रवि बस में खिड़की वाली सीट पर बैठ गया । उसके आगे वाली सीट खाली थी । उसकी पुश्त पर सिर टिका कर वह आराम करने लगा । पता नहीं कब उसे नींद आ गई । कंडक्टर ने जब टिकिट मांगा तब उसकी आंख खुली । उसने देखा कि उसके आगे वाली सीट पर एक लड़की बैठी हुई है । नींद में उसका हाथ उस लड़की के कंधे को छू रहा था । उसने झट से अपना हाथ वहां से हटा लिया । इस पर उस लड़की ने पलट कर एक बार उसे देखा । एक सुंदर सी युवा लड़की थी वह । संभवतः कॉलेज में पढने वाली । उसकी काली काली बड़ी बड़ी आंखों में सम्मोहिनी शक्ति थी । रवि का दिल धक से रह गया ।  टिकट लेकर रवि फिर से सोने का उपक्रम करने लगा । मगर अब नींद उससे कोसों दूर थी । आंखों में दो बड़े बड़े नयन समा गए थे । मन ही मन वह उसे चाहने लगा । खचाखच भरी थी बस । बात करने का कोई जुगाड़ नहीं था उसके पास । उसके दिल में भयंकर तूफान उठ रहा था । इस तूफान के आवेश में रवि ने अपना हाथ लड़की के कंधे पर फिर से रख दिया । लड़की की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई । इससे रवि का हौसला और बढ़ा । रवि ने अपना हाथ लड़की के कंधे पर रखकर थोड़ा दबाया ।उसका दिल धुकधुकी कर रहा था । वह डर भी बहुत रहा था ...