प्यारी माँ


कहतीं हमसे झुर्रियाँ ,यह जीवन था ताप।
संतति के माँ ने हरे,सारे ही संताप।।

सुधा बाँटकर हर घड़ी,पिया हलाहल आप।
माता के तो त्याग को,कौन सकेगा माप।।

वृद्ध हुई तो क्या हुआ,वैसा ही है वेग।
माता ने नित ही दिया,संतति को शुभ नेग।।

पर विडंबना है यही,जब माता लाचार।
संतानें तब ही करें,अनदेखा व्यवहार।।

टूट गया चश्मा 'शरद',घेरें आकर रोग।
नहीं ध्यान उसका रखें,संतानें सुख-भोग।।

जिन बच्चों को पालकर,किया बड़ा,आबाद।
वे ही देते मातु को,रोज़-रोज़ अवसाद।।

आँखों से दुख झर रहा,कातरता का मर्म।
वृद्ध मातु के प्रति नहीं,संतानों में कर्म।।

माँ तो माँ है,बाँटती,दिली दुआ औ' प्यार।
यही कामना वह करे,महके घर-संसार।।

माता भटके,कष्ट में,तो संतति पर लाज।
फर्ज़ निभाने से बचें,तो गिरना तय गाज।।

माता की हो वंदना,सेवा का हो राज।
पुत्र-पुत्रियाँ हों भली,ऐसा बने समाज।
         -प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे
                     प्राचार्य
शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय,मंडला,मप्र
   

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