दिसंबर


मिल ना पाता जनवरी से कभी
दिसंबर का भी अपना ही दर्द है।

बीच बाजार बदनाम ही रहता,
दिन ठिठुरन भरे,  कहते रातें सर्द हैं।

आने की अपनी छोटी सी चाहत में
 महीने ग्यारह यही चुकाता कर्ज है।

मुस्कान सजाता मुख पर अपने
जैसे यही  परिवार का पहला मर्द है।

हाताश कोई, रुठ ना जाए मुझसे 
आगे बढ़ाना सबको उसका फर्ज है।

खुशीयों में सबकी खुश रहता
बाद सभी के आता,पर मन में हर्ष है।

स्वच्छंद प्रकृति का रूप निखारता
लगता मीठे मधुर गीतों की तर्ज़ है।

लगी रहती  झड़ी त्यौहारों की सदा,
दिसंबर खाली जाता,ये भी इसका मर्ज है।

आगे निकल जाए कोई कितना भी
दिसंबर मिल कर ही होता पूर्ण वर्ष है।

मीठे एहसासों से भरा ,माथे पर मेरे सजा,
"कीर्तीजय" जीवन में  , यही दिसंबर दर्ज है।

स्वरचित, मौलिक,

कीर्ति चौरसिया 
जबलपुर (मध्यप्रदेश)

आपका दिन शुभ हो🙏

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