एक जासूस


थक सा गया हूं मैं चलते-चलते,
इन जासूसी रास्तो में भटकते-भटकते,
अब एक घड़ी रूकना चाहता हूं,
ज़रा संभलना चाहता हूं,
मुस्कराहटो में ज़िंदगी बिताना चाहता हूं,
बहूत हो गया ये बेचैनियों का मंज़र,
अब आगे बढ़ना चाहता हूँ,
मिलती नहीं मंज़िल रास्तों की गुफ़्तगू से,
हर सफर में कोई राज़ छूपा है,
खो सा गया हूँ इन बदरंगी गलियों में,
अब रंगीनियों में जीना चाहता हूँ।
प्रिया धामा
भिलाई, छत्तीसगढ़

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