बचपन

आज ना जाने क्यों ये बचपन बहुत याद आता है!
वो शुरुवात जीवन के सफर की सोच कर मन भर जाता है!
कैसे जिया हमने अपना बचपन बड़े प्यार से
सोच कर आँखों में समुंदर उतर आता है।


वो प्यारी सी गुड़िया,गुड़िया की शादी
शादी में सखियों का बनना बाराती
वो सहेली का गुड्डा भी बहुत मन को भाता है
आज ना जाने क्यों ये बचपन बहुत याद आता है!


आज भी याद आती हैं वो गलियाँ वो मुहोल्ला
जहाँ मिलकर हम मचाते थे हो -हल्ला
ना कोई थी चिंता ना कोई शिकायत
वो एक-दूसरे के साथ छुपन-छुपाई का खेल बहुत याद आता है!


आज भी याद आता है मुझे पेड़ वो शहतूत का
जो था मेरे पड़ोस में मेरे हमउम्र दोस्त का
वो याद कर वो अंताक्षरी मेरा मन भर आता है
आज ना जाने क्यों वो बचपन मुझे बहुत याद आता है!


आज भी याद है मुझे माँ के हाथों की वो रोटी
थी उसमे माँ की ममता और साथ में सब्जी आलू की
आज भी याद आती है मुझे पापा की वो डाँट
जिसको सुनते ही हो जाते थे हमारे खट्टे दांत


कभी कभी मन करता बच्ची फिर बन जाऊँ
छोड़ के दुनियादारी उस जादुई दुनिया में जाऊँ
फिर से करूँ इतनी शरारत कि माँ मेरे पीछे भागे
डराकर मुझे डंडे से फिर स्नेह के बाँधे धागे
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ॐ नमःशिवाय
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