"छठ व्रत कथा"
आज जानते हैं।
षष्ठी व्रत को पृथ्वी पर सबसे पहले किसने किया और इसका फल किस प्रकार प्राप्त हुआ।
प्रथम मनु स्वायम्भुवके पुत्र प्रियव्रत को कोई संतान न थी।
उन्होंने महर्षि कश्यप से इस बारे में चर्चा की।
उन्होंने पुत्रष्टियज्ञ करने के लिए कहा।
यज्ञ के फलस्वरूप महारानी मालिनी के गर्भ से एक मृत बालक का जन्म हुआ।
इस समाचार को सुनकर पूरे राज्य में शोक व्याप्त हो गया।
महाराज के हृदय में बहुत ही बरा आघात पहुंचा।
उन्होंने पुत्र के मृत शरीर को अपने वक्ष से लगा उन्मत्तों की भांति प्रलाप करने लगे।
उनसे परिजनों को इतना साहस भी नहीं था कि वह औध्वरदैहिक किर्या के लिए बालक के शव को राजा से अलग कर सके।।
छः दिन तक लागातार प्रलाप करने के बाद वो मूर्छित होकर जमीन पर गिर गए।
छठे दिन एक आश्चर्यजनक घटना घटी।
आकाश से एक ज्योर्तिमय विमान पृथ्वी पर आ गया।
जिसमें दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी।
राजा द्वारा यथोचित स्तुति करने पर देवी ने कहा। मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी देवी हूं।
मैं विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूं।
निसंतान ओ को संतान प्रदान करती हूं।
इतना कह कर देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा।
महाराज के प्रसंता की कोई सीमा न रही। वे अनेक प्रकार से षष्ठी देवी की स्तुति करने लगे देवी ने प्रसन्न होकर राजा से कहा। तुम ऐसी व्यवस्था करो जिससे पृथ्वी पर सभी हमारी पूजा करें।
इतना कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गई। तदुपरांत राजा ने बड़ी प्रसन्नता पूर्वक, देवी की आज्ञा को शिरोधार्य किया।
अपने राज्य में प्रति मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को षष्ठी महोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।
तभी से मृत्यु लोक में बालकों के जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन आदि सभी शुभ अवसर पर षष्ठी पूजन आरंभ हो गई। इनके नवेद में मीठे चावल का होना अनिवार्य है।
आज भी शिशु के जन्म के छठे दिन षष्ठी पूजन बड़े धूमधाम से, लोकगीत, सोहर के साथ मनाने का प्रचलन है। प्रसूता को प्रथम स्थान भी इसी दिन करने की परंपरा है।
इस कथा से यह स्पष्ट होता है। शिशु के संरक्षण एवं संवर्धन से संबंधित देवी षष्ठी देवी हैं। तथा इनकी विशेष पूजा षष्ठी तिथि को होती है। वह चाहे बच्चों के जन्मोपरांत छठा दिन हो या प्रत्येक चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि।
तभी से पृथ्वी पर छठ पूजन का आरंभ हुआ और
सभी व्रती हर्षोल्लास से मनाने लगे।
अम्बिका झा ✍️
Comments
Post a Comment