"काजल"
समातें हैं जैसे ख्वाब इन आंखों में
वैसे काजल भी इन आंखों में समां जाता है
काला होकर भी अपनी एक अलग पहचान रखता है
कभी बढ़ाता है खूबसूरती आंखों की
तो कभी नजर का टीका बन जाता है
कितना भी आगे बढ़ जाए ये समाज मगर
गोरे और काले के भेद को मिटा न पाता है
बातें होती हैं बहुत दिल की खूबसूरती की
मगर ये सच है कि गौरवर्ण ही लोगों को
खूबसूरत नजर आता है
भूल जाते हैं लोग मगर कि
आंखों की सफेदी को काला काजल ही तो
खूबसूरत बनाता है
हर किसी की खूबसूरती की परिभाषाएं
हो सकता है हों अलग अलग
मगर ये सच है कि सादगी का रूप
अपनी एक अलग पहचान बनाता है
जो शुरू होकर भी फीकी सी आंखों से
ह्रदय में उतर जाता है
कितना खूबसूरत होता है वो रिश्ता
जो बिना किसी साजो श्रृंगार के
ह्रदय तक पहुंच जाता है
चाहकर भी वो कभी फिर भुलाया न जाता है
जीवन के हर मोड़ पर मगर
मर्यादा का पाठ भी पढ़ाता है
दूर रखकर मन को हर बुराई से
समां कर आंखों में काजल के जैसे
प्रेम के सही अर्थ को बताता है ।।
कविता गौतम...✍️
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