जब आखिरी अदालत मे तेरा मुझसे सामना होगा मुझे यकीन है पूरा पलड़ा मेरा ही भारी होगा एक तरफ होगी मेरी मोहब्बत दुसरी ओर तुम्हारी जफा होगी एक तरफ होंगे मेरे बहाये आँसू तेरा मुझपे हँसना दुसरी ओर होगा जब चलेगा मुकदमा आखिरी अदालत मे तब मेरा वकील मेरा खुदा होगा। तब तुम पर लगेंगे इल्जाम बेवफाई के और चश्म्दीद गवाह ये आँसू होंगे। उस आखिरी अदालत के तराजू मे जब रखे जायेंगे सबूत तेरी जफा के तब मेरा वकील मेरी ओर से दिखायेग सबूत मेरी वफा के मुझे यकीं है मुकदमा ये चलेगा जब आखिरी अदालत मे तब हर बहस के बाद मुझे मिलेगी जीत आखिरी अदालत मे। कविता गुज्जर
अजीब लगता है अपने समाज में। पुरूष रसोई में,महिला दफ्तर में। पर इसमें क्या ही बुराई है। रसोई में पुरुष भी अच्छाई है। कुछ देवियां बेशक बहाने करती हों। रसोई के कामों से जी चुराती हों। पर मांग है आज के समाज की। दोनों मिल संभाले रसोई और बाहर के काज की। महिला अगर थक कर आए। तो पुरूष भी उसका हाथ बंटाए। पुरूष का जेब हल्का पड़ जाए। तो महिला उसका हाथ बंटाए। -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण
अग्रवाल साहब ने एक और नौकर रामू काम पर रख लिया । खाना बनाने के अलावा घर का सारा काम रामू के जिम्मे कर दिया गया । रवि को केवल नाश्ता, लंच और डिनर तैयार करना था जिसमें उसकी मदद रेणू जी और मृदुला को करनी थी । रवि जब तक अपने कमरे से निकलकर आता तब तक पूरा घर साफ सुथरा चकाचक हो गया था । रवि को बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज अचानक यह कैसे हो गया ? वह कुछ सोच पाता इससे पहले ही रेणू जी ने रामू को बुलाते हुए कहा "शिवा, ये रामू काका हैं । अब से घर का सारा काम ये ही करेंगे" । रवि यह सुनकर चौंका और उसने सीधे रेणू जी के पैर पकड़ लिये । वह रोते रोते बोला "हमसे क्या गलती हो गई मैडम जी, जो आप हमसे इस कदर नाराज हो गई कि हमें नौकरी से भी निकाल दिया ? एक बार हमारी गलती तो हमको बता देते फिर चाहे नौकरी से निकाल देते । मैं चूं भी नहीं करता "। उसकी आंखों से गंगा जमना बहने लगी । "नहीं बेटे, ऐसी बात नहीं है । हम तुमको क्यों निकालेंगे यहां से ? तुमसे कोई गलती नहीं हुई है । काम थोड़ा ज्यादा हो गया है इसलिए रामू काका को और रख लिया है तुम्हारी मदद के लिए । अब तुम केवल खाना और नाश्ते का काम ...
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