स्त्री


जब भगवान स्त्री को बनाता है
उसमे कूट कूट कर सक्षमता भरता है,
और जब पुरुष को बनाता है तो उसे हर तरह से सक्षम बनाता है।फिर पुरुष स्त्री से अपनी तुलना क्यों करता है अगर पुरुष समुंद्र है तो स्त्री समर्पण है।
बिना स्त्री के पुरुष का कोई वजूद नहीं है तो फिर भी पुरुष स्त्री पर हावी क्यों रहता है। वो स्त्री को प्रेम में जीतना चाहता है,पर पुरुष को स्त्री के प्रेम में हार जाना चाहिए।उसे स्त्री के प्रेम के साथ साथ सम्मान भी करना चाहिए।तभी वो अच्छा पुरुष बन सकता है।जिस प्रकार एक स्त्री एक भावुक पुरुष को देख कर आकर्षित होती है उसी तरह एक पुरुष भी एक मजबूत स्त्री पर आकर्षित होता है। जितना आसान स्त्री का मजाक उड़ाना और उस पर छींटाकशी करना है उतना ही मुश्किल स्त्री होना है। और जितना आसान पुरषों को कठोर और अभद्र कहना है उतना ही मुश्किल पुरुष होना है।तभी तो भगवान ने स्त्री और पुरुष को एक दूसरे के पूरक बनाया है।स्त्री को सही गलत स्वीकारने की सोच दे रखी है।पर पुरुष स्त्री की सक्षमता को स्वीकारता ही नही है। अगर पुरुष स्त्री की सक्षमता को स्वीकारता तो पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी न बनता।
हरप्रीत कौर
दिल्ली

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