गलियां उनकी


छोड़ आए हम वो गलियां
जहां हमारा बचपन बीता,
जहां दोस्तों से रोज मुलाकातें
हुआ करती थी,
खेल खेल में एक दूसरे से लड़ाई
वो हसी मजाक सब पीछे छोड़ आए हम।
उन गलियों में प्यार था बेशुमार,
हम बेफिक्र होकर उन गलियों में घूमते,
न वो गलियां रही न वो दोस्त,
पुराने दोस्त जुदा हो गए,
रह गई बस उनकी यादें।
वो गलियां अब सुनी हो गई है
जो गलियां कभी अपनी हुआ करती थी।
वो अंजान हो गई हैं।

हरप्रीत कौर
दिल्ली

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें