तेरे आने का इंतजार

सात वचनों  में बांधकर तू मुझे अपने घर लाया था
मैंने भी तेरे सारे गमों और खुशियों को तहे दिल से अपनाया था
तेरे मां बाबा को अपना मां बाबा बनाया था
तुझसे जुड़े हर रिश्ते की डोर में खुद को बांध पाया था
जानती थी तू इस देश का सिपाही है
मुझसे किये वादों से पहले तूने इस देश की रक्षा करने की कसम खाई है
कि मेरे हाथों की मेहंदी भी ना उतरी थी
 जब सरहद से आया तेरा बुलावा था
उस पल तुझसे दूर रहने की मैं सोच भी ना पाई थी 
तेरे साथ सातों जन्म बिताने की कल ही तो मैंने कसम खाई थी
कि इन हाथों की मेहंदी भी ना उतरी और तेरे जाने का वक्त आया था
फिर तेरे इंतजार में मैने पल पल तेरी याद में अपना हर एक पल बिताया था
मां की बूढ़ी आंखों में भी तेरा इंतजार झलकता था
उनका एक लाडला बेटा उनकी आंखो में हरदम तारे की तरह चमकता था
बाबा के टूटे चश्मे में भी तेरा इंतजार दिखता था
जब उनकी छड़ी  हाथों से छूट जाए एक तेरा ही तो सहारा उन्हें दिखता था
पर जब देखती थी मां बाबा को ऐसे तब यह सोचती थी
कि तेरे आने के इंतजार ने क्या सच में उनसे ज्यादा मुझे तड़पाया था 
हां बेशक मेरे पायलों की रुनझुन तेरे कानों में घुलने को बेताब थी 
पर ना जाने क्यों तेरे इंतजार में थामें ये मौन का साथ थी
मेरे सिंदूर मैं लाली तो थी मगर इसमें खुशियों की चमक धुंधली हर बार थी 
मेरी चूड़ी भी खनक के तुझे ही पुकारती थी
पर तू सुन ना पाएगा यह सोच के हाथों में ही इसकी खनक दबी रह जाती थी
अपने मौन से मैने किया तेरा मेरे मन में इंतजार था
ओर मेरा यही मौन शोर मचाती हर बार था
जानती हूं मुझसे ज्यादा तेरा फर्ज करता तेरा इंतजार था
यही बात इस दिल को मैंने समझाया बार-बार था
तेरे लिए ही तो आई थी अपने सारे बंधन तोड़ के
अब तुझसे भी दूर हूं उन सब से मुख मोड़ के
कि तेरे आने का  इंतजार भी कैसा है
पल पल बढ़ता इस दिल में तेरा प्यार है
मैं नई नवेली दुल्हन करती रोज साज शृंगार हूं 
पर तेरी एक नजर को तरसती हर बार हूं
 तेरी थोड़ी सी खबर एक चिट्ठी के लिए रहती हरदम बेकरार हूं
सोचती हूं वह पल भी कैसा होगा 
जब तू अचानक आकर मेरे सामने खड़ा होगा
अब तक तो देखा भी नहीं तुझे एक नजर भर के ठीक से
बस तेरी तस्वीर को सीने से लगाए तुझे चाहा है
सोचती हूं तेरे आने का जो इतना इंतजार लिए बैठी हूं
तुझे देख कर तुझे सीने से लगा पाऊंगी
या तुझे देख कर शर्मा के तेरी ही बाहों में छुप जाऊंगी
सच किसी अनजाने से जुड़ा यह कैसा बंधन है
बस वह सात वचन ही है हमारे साथ ओर तुझ से जुड़ गया मेरा सारा जीवन है
और उन सात वचनों के सहारे ही करती तेरे आने का इंतजार हूं
मैं अपने दिल में तेरे प्रेम का ज्योत जलाए तेरी एक दरस को बेकरार हूं

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*रचनाकार प्रांशु गुप्ता (PG)*
रायगढ़ छत्तीसगढ़
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित रचना

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