चाहत

महफ़िल हर बार गुलज़ार होती थी तेरे आने से
    पर अब तो सजती है किसी और बहाने से
      आजाद हो तुम मेरी चाहत से
अब इश्क़ न होगा हमे किसी और अफसाने से

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