पुनर्विवाह भाग - १६
रविश ने मुस्कुराते हुए अंगूठी पहनाई । फिर सब खाने की तैयारी करने चले गए । क्योंकि शादी के घर में मेहमान ज्यादा थे , तो रविश के बड़े पापा ने सबको पंगत में बैठकर खाना खाने के लिए कहा । एक तरफ घर के सब पुरूष और बच्चे बैठ गये । बाकि घर की महिलाएं सबको खाना परोसने लगी । रविश के बड़े पापा खुश होते हुए बोले - आज कई सालों बाद ऐसे पंगत में बैठकर खाने का अपना अलग ही मजा है । हां भैया , भैया आपको याद है जब गांव में ऐसे ही सब पुरूष बैठकर खाते थे और महिलाएं खाना परोसती थी । रविश के पापा ने कहा ! उसके बाद जब महिलाएं खाने बैठती तो बाबूजी और बाकि सारे पुरुष सभी महिलाओं को खाना परोसते थे । कितने प्यार से बाबूजी , मां को खाना परोसते थे और मां सर पर पल्लू लिए शर्माती रहती थी । चलो फिर तय रहा । हम सब खाने के बाद सभी महिलाओं को खाना परोसेंगे । जी भैया ... रविश के पापा ने कहा । सरोज जी - क्या आप भी , हम सब है ना हम अपना खाना खुद ही परोस लेंगी । क्यूं जीजी ! हां सरोज , ठीक कह रही है । रानी - नहीं बड़ी मां , बड़े पापा और पापा सही कह रहे हैं । आज ये सब खाना परोसेंगे और हम रानी कुमारी सबका विडियो बनायेंगे । रानी की बात सुनकर सब हंसने लगे । महिलाएं जब खाने बैठी तो , सब अपनी - अपनी पत्नियों को उनकी पसंद की चीजें परोसने लगे । रविश के बड़े पापा बड़े प्यार से , अपनी पत्नी को खीर परोस रहे थे । वहीं रविश के पापा सरोज जी को उनकी पसंद की सब्जी परोस रहे थे । लेकिन रवीश को समझ नहीं आ रहा था कि , स्वाति को खाने में क्या पसंद है । इसलिए वो सब खाने की चीजों को बारी- बारी से स्वाति के पास ले जाकर पूछ रहे थे । तभी अचानक शिवांश , रविश को अपने पास इशारे से बुलाता है । शिवांश - पापा , मम्मा को ये सब पसंद नहीं है । उन्हें तो करेले की सब्जी साथ में पतली दाल और मीठा अचार बहुत पसंद हैं । रविश - थैंक्यू सो मच ....शिवू मेरी मदद करने के लिए । इतना कह कर रविश सीधे रसोई घर की ओर जाते हैं । और एक बर्तन में रखें करेले की सब्जी ( जो उनके बड़े पापा के लिए बनी थी ) स्वाति के लिए ले आते हैं । साथ में मीठा अचार भी । इधर स्वाति को खाने की इच्छा ही नहीं हो रही थी । क्योंकि इतने दिनों से वो शादी के शुरुआती दिनों से ही ज्यादा मसाले वाला खाना खाकर ऊब गई है । अब उसे अपनी पसंदीदा गाने की याद आ रही है । तभी सामने से रविश आकर करेले की सब्जी और मीठा अचार परोसते हैं ।
क्रमशः
रचनाकार
श्वेता सोनी
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