कहानी आंसुओं की भाग ९



  फिर अनेकों दिनों तक दुश्यंत का फोन नही आया।। हालांकि सुनंदा की भावी सास और ससुर से रोज बात होती थी। राधा और विशाल दोनों सुनंदा का मन हल्का करते। उसे हौसला देते। सुनंदा भी मन की पीर भूल जाती।

   एक दिन सुनंदा के नाम एक पत्र आया। आज के जमाने में पत्र कौन लिखता है। किसी समय तो एक दूसरे को सूचना देने का पत्र बड़ा जरिया था। पर आजकल तो पत्र केवल विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की नियुक्ति पत्र तक सीमित रह गये हैं। वह भी ज्यादातर इंटरनेट से डाउनलोड कर लिये जाते हैं।

   सुनंदा ने पत्र खोला। बुझा हुआ चेहरा खिल गया। हालांकि पत्र बहुत बड़ा नहीं था। दुश्यंत ने अपना हालचाल लिखा था। सुनंदा और मम्मी, पापा का हालचाल पूछा था। अपना पता लिखा था। पत्र का अंत एक छोटे से मजाक के साथ किया।

  " चलिये। अच्छा है। इस बहाने हम फिर से पत्र लिखना सीख जायेंगे।"

सुनंदा को जीने का आधार मिल गया। दुश्यंत के खत पढकर फिर सुनंदा उसका उत्तर लिखती। शुरुआत में तो समझ में ही नहीं आता कि क्या लिखा जाये। धीरे धीरे पत्र लिखने के बहाने दोनों अपने दिलों को अच्छी तरह व्यक्त करने लगे। अक्सर कुछ शेर या कविताओं की पंक्तियाँ पत्रों का भाग बनने लगे। दूसरे कवियों की कविताएं लिखते लिखते मन में खुद की कविताएं भी बनने लगीं। कविताओं का दिल से बड़ा खास रिश्ता होता है। जो दिल की आवाज को लिख दे, वही कवि बन जाता है।

  पत्र लिखना फोन से भी ज्यादा मजेदार लगने लगा। अब सुनंदा को जब भी महबूब की याद आती, उसका खत पढने लगती। खतों में दुश्यंत की नदजीकी महसूस होती। 

   ऐसे ही दिन गुजरते रहे। पर फिर कई दिनों तक दुश्यंत के खत भी आने बंद हो गये। सुनंदा उसे लगातार खत लिखती। पर दुश्यंत का कोई जबाब नहीं आता। 

   दूसरी तरफ दुश्यंत के घर पर सन्नाटा फैला हुआ था। आर्मी से आये एक पत्र ने सभी की नींद उड़ा दी थी। आतंकवादियों से एक मुठभेड के बाद दुश्यंत का कोई पता नहीं था। वैसे आर्मी दुश्यंत को तलाश रही है। पर ज्यादा संभावना यही है कि दुश्यंत मुठभेड़ में शहीद हो गया हो। इन वर्फीली चोटियों की खाइयों में अक्सर सैनिकों के शव मिलते रहते हैं। जो बहुत समय से गायब हैं। जो बार बार घटित हो, परिकल्पना उसी के अनुसार होती है। पर आर्मी का नियम कि जब तक शहीद की मृत देह न मिल जाये, उस सैनिक को शहीद नही घोषित कर सकते । 

  दिन बीतते गये। कुछ दिन तो दुश्यंत के परिवार बालों ने संतोष किया कि दूश्यंत मिल जायेगा। पर एक दिन उनका सब्र टूट गया। उस दिन विशाल जी, राधा जी और शुचि बहुत रोये। अभी तक दुनिया को छिपाते आये उन्होंने पहली बार अपने बड़े भाई और भाभी को सूचना दी। 

    दुश्यंत का कोई पता नहीं था। यदि दुश्यंत वापस आ गया तो उसे केवल ईश्वर का चमत्कार ही कहा जायेगा। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि अब सभी की जिंदगी दुश्यंत की याद में रोते हुए गुजरेगी। इसपर किसी का वश नहीं है। पर वह किया जा सकता है जिसपर उनका वश है। एक युवती लड़की अपने नव जीवन के स्वप्न देख रही है। अभी उसका कुछ नहीं बिगड़ा है। सुनंदा का पूरा जीवन उसका इंतजार कर रहा है। हालांकि मन की यादों को निकाल पाना अति कठिन होता है। फिर भी कोशिश की जा सकती है। सुनंदा के माता पिता को सच बताना ही चाहिये। सुनंदा को फिर से अपने जीवन के विषय में सोचने को समझाना होगा। अब उससे ऐसा अपनत्व लगने लगा है कि उसका हित देखना मजबूरी हो जाती है। 

   उस दिन राजमोहन जी के घर भी रुदन हुआ। राजमोहन व सुप्रिया तो कुछ देर रोये पर सुनंदा की आंखों में आंसू आये तो फिर बंद ही नहीं हुए। पिता और माता के बार बार समझाने का असर नहीं हुआ। फिर बूआ भी उसे समझाने आयी। पर सुनंदा के आंसू नहीं रुके। अंत में विशाल जी और राधा खुद आये। 

  " कब तक रोती रहोंगी बेटी। अब उसे भूल जा। वह तो निर्मोही था। बीच में छोड़कर चला गया। तेरा पूरा जीवन पड़ा है। अब अपने विषय में सोच।" 

  सुनंदा कुछ क्षण शांत रही। फिर अपना निश्चय कहने लगी। पितामह भीष्म की तरह उसने भी अपने मन में कुछ बड़ा सोच लिया था। अब वही बड़ा कहने जा रही थी। 

" पिता जी, माता जी। अब इन आंसुओं को मत रोकिये। ये आंसू मेरे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। एक बार दुश्यंत जी को अपना पति मानकर किसी अन्य को मैं दिल नहीं दे सकती। अब आंसुओं की कहानी चलती रहेगी। या तो खुद एक दिन दुश्यंत जी आकर अपने हाथों से मेरे आंसू पोंछेंगे या इन्हीं आंसुओं के साथ अपना जीवन गुजार दूंगी। विवाह तो मन का मन से होता है। मेरा विवाह तो हो चुका है। मैं दुश्यंत जी का इंतजार करूगी। जिंदगी के अंत तक उनका इंतजार करूंगी। यदि दुश्यंत जी शहीद हो चुके हैं तो फिर मैं भी एक शहीद की विधवा हूं। शहीद की विधवा का सौभाग्य बहुत सौभाग्यशालियों को मिलता है। मैं इस अवसर को छोड़ नहीं सकती। "

  एक बार फिर सुनंदा को समझाने का प्रयास किया। अंत में समझाने बाले हार गये पर सुनंदा नहीं हारी। प्रेम पथ की साधिका को उसके साधन से डिगा पाना भला किसके वश की बात है। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत, प्रशांत '

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