बचपन और बारिश


कापी के पिछले पन्नों से,बनती थी जब नाव,
बारिश के पानी में भी तब,छप छप करते पाँव!

भीगा तन, और भीगा मन,अंतरमन भी मस्त मगन,
काले काले बादल भी,लगते थे तब मनभावन!

भीगे बस्ते लेकर हम,जब पहुँचा करते नित्य सदन,
पुस्तकों की कतार लगा,सिर्फ सुखाने का था मन!

रास्ते में ढूँढा करते थे,कोई शीतल सी छाँव,,
बारिश के पानी में,छप छप करते पाँव!

साड़ी के पल्लू से माँ भी, रगड़ रगड़ कर बाल सुखाती,
अदरक वाली चाय बनाती,बार बार माथा सहलाती!!

मस्ती वही थी बारिश की,फिकर नहीं थी खारिश की,
कितना प्यारा था वो बचपन,भीग जाएं चाहे पैसे पचपन!!

कीचड़ में सन जाते थे,छोटे छोटे गाँव,
बारिश के पानी में भी,छप छप करते पाँव !!

बडे़ हुए तो सहमे ऐसे,इस बारिश में भीगे कैसे,
मस्ती बिक गई जेबों मेंं,कुछ कागज के नोटों में!!

बारिश वही है,लेकिन अब,मायने बदल गए मस्ती के,,बचपन का अल्हड़पन बीता
दिन आ गए गृहस्थी के!!

निर्धारित रस्ते में रहते,अब गायब सब ठाँव,
बारिश के पानी में भी,छप छप करते पाँव!!

आने से पहले बारिश अब,बन जाते पापड़ ,अचार,
कुछ महीनों पहले ही करती,गेंहू चावल, मसाले तैयार !!

मुश्किलों की अब बौछारें हैं,बंगला, और मोटर कारें हैं,
"कीर्ति"  की अब नाव ठोस है,साथ बहुत सी पतवारें हैं  !!

पर उन्नति में हुआ नदारत,चौपाली बरताँव
बारिश के पानी में भी तब,छप छप करते पाँव !!!

स्वरचित, मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित

      कीर्ति चौरसिया
     जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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