एक गुमनाम कवि



एक गुमनाम कवि आवारा हो गया
बेरोज़गारी के इस दौर में निकम्मा नालायक बैचारा हो गया
वो लिखता रहा मिटाता रहा
दिल में अरमान सजाता रहा
शब्दों के शंखनाद से दूनिया को जगाता रहा
सुनाता रहा कभी जिंदगी के अफसाने
कभी दर्द भरे नगमे कभी प्यार भरे तराने
दूनिया जागकर भी सोई रही
खुद अपने ही ख्यालों में खोई रही
सितमगर वक्त का मुकद्दर तो देखो
मौत आने से पहले ही जीवन पथ से किनारा हो गया  
एक गुमनाम कवि आवारा हो गया
बेरोज़गारी के इस दौर में निकम्मा नालायक बैचारा हो गया

कितनी जीवन की कीताबों पर अब भी धूल जमीं
कितने जीवन के पन्ने अब भी खुले ही नहीं
इस अमीरजादी मगरूर  दूनिया को देखो
जिते जी ना इज्जत दी ना शोहरत दी
और वो किताब भी उस वक्त मशहूर हुई
जब जिंदगी की किताब से सांसें रूखसत हुई
गुमनाम शायर की महफ़िल में मजमा भी उस वक्त लगा
जब मौत की गहरी नींद सो गया।
एक गुमनाम कवि आवारा हो गया
बेरोज़गारी के इस दौर में निकम्मा नालायक बैचारा हो गया

बिक गए चंद अशर्फियों में वो अल्फाज
जिन्हें लिखा था कभी तन्हा बेबस रातों में जागकर
दिल की कलम को खंजर बना बूंद बूंद दिल से लहू निकालकर  
रखा था कभी जिन्हें हिफाजत से दिल के तहखाने में संभालकर।।
पिंटू कुमावत'श्याम दिवाना'🙏🙏💐💐

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