रिश्तें


वैसे तो संसार में
रिश्तों की भीड़ हैं
पर जीया वही जाता हैं
जो दिल से निभाया जाता हैं
प्रेम सहकार हो जहाँ
निःस्वार्थ भाव रहता हो
स्वार्थ से परे जब
हृदय में बसता हो
रिश्ता वही जो
दिल में रहता हो
सरिता से निश्छल
बहते रहते है रिश्ते
स्वार्थ भावना से
नाला बन जाते हैं
प्रेम की सुगंध नही 
दुर्भावना की दुर्गंध होती हैं
ईर्ष्या, बैर, मनमुटाव
से फिर जाम हो जाता हैं
रिश्ता वही जो,
दिल से निभाया जाता हैं।
दूध में पानी की तरह
मिलकर एकसार होता हैं
बैर की एक बूंद से
रिश्ता फट जाता हैं
चाहें जितना मथों
करलों जो हो उपाय
पर फिर रिश्तों से
प्रेम घी नहीं निकल पाता है
रिश्ता वही जो
दिल से निभाया जाता हैं।
छोटे ही गिरते हैं
अक्सर बड़ो की नजरों से
बड़े भी गिर जाते हैं
कभी अपनों की निगाहों से
उम्र से सम्मान नही मिलता
खजूर से जैसे छाँव नही
प्यार से ही आदर मिलता
जिसका कोई छोर नही
स्वार्थी रिश्तों से
प्रेम किया नही जाता
रिश्ता हर किसी से
दिल से निभाया नही जाता।

गरिमा राकेश गौत्तम
पिता बजरंग लाल गौत्तम
माँ संतोष गौत्तम
खेड़ली चेचट कोटा

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