पहली बारिश


तुझे भूलने की हर कोशिश, नाकाम हो गई,
पहली बारिश क्या बरसी, खबर आम हो गई!!

बात जो पहुंची नहीं, तुझ तक वही ज़िंदगी का पैगाम हो गई,
हमने तो छुपाना चाहा था,आंखों से बारिश खुलेआम हो गई!!

बढ़ गई जब दूरियां,सिसकियां तमाम हो गई,
हर लम्हा रास्तों पर नजर,इंतजार का अंजाम हो गई!!

शायद ढूंढ लाएं तुझे,ये काली बदलियां,
एहसासों से भरी ज़िन्दगी,बस तेरे नाम हो गई!!

मौसम की ये हरकतें,यादों को परेशान कर गई,
तुझे छूकर आती है मेरे पास, बारिश की ये हवाएं भी बदमाश हो गई!!

स्वरचित, मौलिक,, सर्वाधिकार सुरक्षित,,

कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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